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Thursday, April 18, 2019

विश्व धरोहर दिवस

आज विश्व धरोहर दिवस है.
क्या आप इसके बारे में जानते हैं?क्या आपने अपने बच्चों से कभी इस बारे में बात की है?
जितना आप बाज़ार को जानते हैं क्या उसके आधा भी अपने धरोहरों को जानते हैं?
क्या आप धरोहर के महत्व को समझते हैं?
याद रखिये यह हमारे लिये मूर्त इतिहास के गवाह हैं और संस्कृति के संवाहक भी.आप अपने इतिहास को कितना जानते है,अपनी संस्कृति को कितना जानते हैं, आपके जीवन में इसका कितना महत्व है...यह सब मिलाकर आपका एक व्यक्तिव निर्माण होता है. आप अपने बहुत को कितना जानते,समझते हैं और इसी पर भविष्य की नींव मजबूत होती है.
ध्यान रखिये की अपने भविष्य के इसे सहेज कर रखें,क्योंकि इससे खूबसूरत उपहार उनके पूर्वजों द्वारा प्रदत्त और कुछ नहीं.
अपने देश,अपनी मातृभूमि के अनुराग और वैश्वीकरण के प्रति लगाव का एक प्रमुख आकर्षण ये धरोहर भी हैं.यदि ऐसा ना होता तो विश्व पटल पर UNESCO world heritage की स्थापना ना होती.
अपर्णा झा

छवि : वेब इमेजेज

Wednesday, March 27, 2019

वोट अपील

*Congratulations!* for being shortlisted for the next phase of *Women WRITE Now Competition* - *Voting Phase*.

Story : 'स्मृति अशेष'

Hello, I feel very happy to announce that I have been selected by StoryMirror for phase 2 of Women WRITE Now Competition. Now I need your support to win the competition.  Please visit this link: https://awards.storymirror.com/women-write/hindi/story/
Go to my name (You can search for my name in search bar) and click on vote button.
You will have to login to StoryMirror to vote for me. Please Vote!

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2255362301447227&id=100009204370050&sfnsn=mo

Thursday, March 7, 2019

महिला सशक्तिकरण


कोमल है कमज़ोर नहीं तू शक्ति का नाम ही नारी है....... क्या खूब पंक्तियाँ हैं इस गीत की।
हमारे देश में यूँ तो माँ दुर्गा की पूजा होती है जो कि एक शक्ति का ही रूप हैं। पर फिर भी महिला सशक्तिकरण की ज़रूरत आ पड़ी यहाँ। इसकी ज़रूरत क्यों आई  या फिर क्या ये हर वर्ग की औरतों के लिए ही चाहिए थी , क्या आज इससे हर महिला को लाभ मिल रहा है या फिर कहीं कहीं महिलाएं ही तो इसका दुरूपयोग नहीं कर रही ये सब जानना भी उतना ही ज़रूरी है। सदियों से यही रटी - रटाई बात दोहराई जाती है कि कहीं न कहीं महिला को कमतर आँका जाता है इस पुरुषप्रधान समाज में। इसमें १०० फीसदी झूठ भी नहीं है। महिलाओं के पास अधिकार होना तो दूर की बात होती थी उनको अपने अस्तित्व को साबित करना ही बहुत मुश्किल होता था। एक आम महिला की क्या बात करें रानियों - महारानियों को परदे में रहना पड़ता था।उनके लिए भी कानून राजमहल के राजकुमारों से भिन्न ही होते थे। शिकार पर जाना , युद्ध में जाना ये काम राजकुमारों के ही समझे जाते थे। समय समय पर कुछ राजकुमारियों ,वीरांगनाओं ने इस घिसे-पिटे नियम से उप्पर उठ कर काम किया।चलिए वापिस एक आम महिला पर आते हैं। समय के साथ साथ हमारे देश में भी बहुत से बदलाव आये महिलाओं के लिए।  बालिग होने पर ही शादी का अधिकार मिला , दहेज़ प्रथा ,सती प्रथा जैसी अनेक कुरीतियों के खिलाफ कुछ नियम बने जो की महिलाओं के लिए बहुत कारगर साबित भी हुए। पर क्या सचमुच इस सब से महिला सशक्तिकरण हो गया। जब तक पूरा समाज और खुद लड़कियां ये नहीं समझ लेती कि पढ़ाई लिखाई , खेल कूद , नौकरी करना , अपने विचार सबके साथ साँझा करना और ज़िन्दगी को अपनी नज़र से देखते हुए आगे बढ़ना  उनके लिए भी उतना ही जरुरी है जितना की लड़कों के लिए तब तक जितने मरज़ी कानून बनते रहें कोई फायदा नहीं होने वाला। जब तक इस सब की जानकारी हर अमीर गरीब , जाति पाती की लड़कियों तक नहीं पहुंचती ये सशक्तिकरण बस मुट्ठी भर लोगों के लिए ही रह जायेगा।

                                          हर सिक्के के दो पहलु होते हैं। तो इसके भी हैं।  कई जगह लड़कियां अपने लिए बने कानून का नाजायज़ फायदा उठती हैं और कुछ पुरुषों या ससुराल वालों को परेशान करती हैं। और फिर कानून ऐसे बने होते हैं कि लड़का या लड़के वाले कितना भी हाथ पाँव मार लें , सर पटक लें पर कानून के दाँव पेच में फँस ही जाते हैं। इस पहलु पर भी गौर करना अत्यंत ज़रूरी है।
                                         तो महिला सशक्तिकरण जितना जरुरी है उतना ही उसको ठीक तरीके से अपनाना भी।महिला ने किसी को साबित करके नहीं दिखाना की वो क्या है और क्यों साबित करना है किसको करना है ???? अगर लड़की अच्छा पढ़ी लिखी होगी , शारीरिक तौर पर बलशाली होगी , मजबूत व् पक्के इरादे होंगे तो वो अपने कोमल हृदय के साथ भी समाज को सिर्फ आईना दिखाने में ही सफल नहीं होगी बल्कि समाज को एक नए रूप में बदलने में कामयाब हो सकती है। देर है तो बस हर तबके तक इन चीज़ों को पहुंचने की और एक सन्देश की कि "कोमल है कमज़ोर नहीं तू शक्ति का नाम ही नारी है जग को जीवन देने वाली मौत भी तुझ से हारी है "

अमिता गुप्ता मगोत्रा 
 मौलिक रचना
Photo credit : INTERNET

Wednesday, February 13, 2019

Happy Valentine's Day





जब से मिले हैं , एक यही दिन तो
खास नहीं था, हमारे प्यार के
इज़हार के लिए
याद भी नहीं कि वो पहली पहली बार
एक दूसरे से कब इज़हार किया था और कैसे
आपका वो अंदाज़े बयाँ कुछ अलग ही होता था
सब सच कहते कहते, थोड़ा कुछ छुपा जाते
कुछ भी ना कहते हुए भी
आँखों से होते हुए
दिल की गहराइयों में उतर जाते
आज इतने सालों बाद भी सिर्फ
ये दिन ही हमारे प्यार का साक्षी नहीं होता
वो हर पल ,हर लम्हा साक्षी बन जाता है
जब हर छोटी छोटी बात
हम एक दूसरे के लिए कहते हैं , सुनते हैं
वो हर छोटे से छोटा काम
एक दूजे की ख़ुशी के लिए करते हैं
और साक्षी होती है, हमारी बिटिया
जो हमें लड़ने नहीं देती
हमारे बहस करने पर वो रो पड़ती है
हमसे फिर न लड़ने झगड़ने का वादा लेती है
और हम दोनों उसके आंसुओं को पोंछते हुए
उससे मनुहार करते हैं कि वो हमसे न रूठे
ये सब तो बस हो जाता है
हम झगड़ते थोड़ी हैं।
हमारा प्यार अब वो भी तो समझती है
हमने कभी उसको, बताया तो नहीं
प्यार का एहसास, वो जान जाती है।
ये एहसास हमारे बीच सिर्फ आज के दिन ही नहीं
हमेशा यूँ ही बना रहे।
लम्हा लम्हा , कतरा कतरा हमारे दिलों का
प्यार का सागर एक दूजे की मोहब्बत से
भरता रहे,
फिर भी, जग की रीत
निभाते हुए मैं आपसे कहती हूँ
हैप्पी वैलेंटाइन डे

अमिता गुप्ता मगोत्रा

Thursday, February 7, 2019

जिस तन लागे सो तन जागे







जिस तन लागे सो तन जागे

इस बार सर्दियों में छत पर अपनी रसोई के लिए कुछ छोटे और बड़े गमलों में सब्जियाँ लगाई थी। जब बीज को रोपा था तो पौधे निकलने का इंतज़ार था। रोज़ सुबह छत पर जाकर देखना की अब किसी बीज से कुछ फूटा….अब फूटा बस अब पनपा...उन नन्हे नन्हे पौधों को मिट्टी से बाहर निकलेते देख, बढ़ते देख जो खुशी मिलती है उसको शब्दों में बयाँ करना मुश्किल है।अब तक तो सब बहुत अच्छा चल रहा था । परंतु ये दो दिन की मूसलाधार बारिश और ओलावृष्टि ने छोटे छोटे पौधों को खूब नुकसान पहुंचाया। जो कोई छोटे गमले थे वो तो मैंने अंदर कर लिए थे पर बड़े गमलों को….उनको तो हिलाना भी मुश्किल था। अब थोड़ा मौसम ठीक होने और ही देख पाऊँगी।
बात मेरे ही गमलों की होती तो बात कुछ और होती…..वो किसान जिसकी रोज़ी रोटी ही खेती है, अपने लिए हमारे लिए सारे संसार के लिए….नीले अम्बर के सीधा नीचे…...वो किसान अपने खेतों को उठा कर कहाँ जाए, किधर जाए…….किसको फरियाद करे कहाँ गुहार लगाए…..साल भर की मेहनत कुछ दिनों में ही कुदरत के कहर से बर्बाद हो जाती है….वो कहते हैं न कि किये कराये पर पानी फिर जाना….सच में यहां तो वही बारिश का पानी जो वरदान होता है फसलों के लिए ...ऐसे में श्राप बन जाता है…..ये दुख उस किसान को अकेले ही बर्दाश्त करने होता है क्योंकि हम सब तो अपने घरों में बैठे ऐसे मौसम का मज़ा लूट रहे होते हैं...अपनी अपनी रसोइयों में कढ़ाही चढ़ा कर, पकोडे तल कर….

सच ही है न कि जिस तन लागे वो तन जाने……

अमिता